पंच केदार 🛕
पंचकेदार उत्तराखंड एवं भारत में स्थित पाँच पवित्र हिंदू मंदिरों का एक समूह है, जो भगवान शिव को समर्पित हैं। ये पाँच मंदिर हिमालय की ऊंची पहाड़ियों में स्थित है और हिंदू धर्म में अत्यधिक महत्व रखते हैं।
पौराणिक कथा के अनुसार , महाभारत युद्ध के बाद पांडव भगवान शिव से आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते थे,
लेकिन शिव उनसे नाराज थे। भगवान शिव एक बैल के रूप में अतध्यान हो गए और उनके शरीर के अलग-अलग हिस्से पाँच स्थानों पर प्रकट हुए, जो पंचकेदार के रूप में जाने जाते हैं।
केदारनाथ हिंदू धर्म का एक प्रमुख तीर्थ है | जहाँ का मंदिर भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगी और पचकेदारों में प्रमुख है। यह उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में 3583 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।
पंचकेदार के मंदिर
1) केदारनाथ (3,583 मीटर ऊंचा
स्थानः रुद्रप्रयाग जिला
भागः बैल की पीड (कबड
विशेषता सबसे प्रमुख और महत्वपूर्ण मंदिर, जो बारह ज्योतिलिंगों में से एक है।
2)
तुंगनाथ (3,680 मीटर ऊंचा
स्थानः रुद्रप्रयाग जिला
भागः बैल की बाहे (भुजाएँ
विशेषताः दुनिया का सबसे ऊँचा शिव मंदिर।
3)
रुद्रनाथ (2,286 मीटर ऊँचा
स्थानः चमोली जिला
भागः बैल का मुख
विशेषताः यहाँ शिव के मुख की पूजा की जाती है।
4) मध्यमहेश्वर (3490 मीटर ऊंचा
स्थानः चमोली जिला
भागः बैल की नाभि
विशेषताः दूरस्थ और प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर ।
5)
कल्पेश्वर (2200 मीटर ऊँचा
स्थानः चमोली जिला
भागः बैल की जटाएँ
विशेषताः एकमात्र मंदिर जहाँ पूरे वर्ष पूजा होती है. और यह एक गुफा में स्थित है।
केदारनाथ
Zकेदारनाथ मंदिर साल में केवल कुछ महीनों के लिए खुलता है क्योंकि सर्दियों में भारी बर्फतारी होती है।
खुलने का समयः अप्रैल के अंत या मई की शुरुआत
बंद होने का समयः दीपावली के बाद ((अक्टूबर नवंबर)
सबसे अच्छा मौसमः मई से जून और सितंबर से अक्टूबर का समय यात्रा के लिए अनुकूल है।
पौराणिक कथा
केदारनाथ की स्थापना से जुड़ी दो प्रमुख कथाएं हैं :
पांडव कथा :-
महाभारत युद्ध के बाद,
गोत्रहत्या के पाप से सुक्ति पाने के लिए पांडवों ने यहां तपस्या की। भगवान शिव ने बैल का रूप धारण किया और उनका कूबड ((पृष्ठ भाग) केदारनाथ में प्रकट हुआ।
नरनारायण
की तपस्या :
भगवान विष्णु के अवतार नर-नारायण ऋषि की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव यहां ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हुए।
वास्तुकला :- मंदिर स्थानीय बड़े पत्थरों को तराशकर लगभग 6 फुट ऊंचे चबूतरे पर बना है। केदारनाथ मंदिर अत्यंत सुंदर है। बर्फ के बीच में विराजमान भगवान शिव का ये मंदिर अद्भुत लगता है। वास्तुकला की बात करें तो केदारनाथ मंदिर 85 फीट ऊंचा, 187 फीट लंबा और 80 फीट चौड़ा है । इसकी दीवारें 12 फीट मोटी है और बेहद मजबूत पत्थरों से बनाई गई है। मंदिर को 6 फीट ऊंचे चबूतरे पर खड़ा किया गया है। यह हैरतअंगेज है कि इतने भारी पत्थरों को इतनी ऊंचाई पर लाकर तराशकर कैसे मंदिर की शक्ल दी गई होगी। जहां पर चढ़ कर जाना ही इतना मुश्किल है, वहां इतना विशालकाया और सुंदर मंदिर बनवाना किसी चमत्कार से कम नहीं है। जानकारों का मानना है कि पत्थरों को एक-दूसरे में जोड़ने के लिए इंटरलॉकिंग तकनीक का इस्तेमाल किया गया होगा। यह मजबूती और तकनीक ही मंदिर को नदी के बीचों बीच खड़े रखने में कामयाब हुई है।
मन्दिर को तीन भागों में बांटा जा सकता है। पहला- गर्भगृह , दूसरा- मध्य भाग और तीसरा- सभा मण्डप।
गर्भगृह के मध्य में भगवान श्री केदारेश्वर जी का स्वयंभू ज्योतिर्लिंग स्थित है। केदारनाथ के चारों तरफ प्राकृतिक सुंदरता के नजारे देखने को मिलते हैं। यहां एक तरफ 22,000 फीट ऊंची केदारनाथ पहाड़ी, दूसरी तरफ 21,600 फीट ऊंची कराचकुंड और तीसरी तरफ 22,700 फीट ऊंचा भरतकुंड है। इन तीन पर्वतों से होकर बहने वाली पांच नदियां हैं मंदाकिनी, मधुगंगा, चिरगंगा, सरस्वती और स्वरंदरी। इनमें से कुछ पुराण में लिखे गए हैं। यह क्षेत्र "मंदाकिनी नदी" का एकमात्र जल संग्रहण क्षेत्र है।
मुख्य आकर्षण :-गर्भगृह में स्थित स्वयंभू ज्योतिर्लिंग। पूजा शैव पद्धति से होती है और श्रद्धालु ज्योतिर्लिंग को स्पर्श कर सकते हैं।
अन्य प्रतिमाएं -:- मंदिर में गर्भगृह के बाहर मां पार्वती, सभामंडप में पंच पांडव और श्री कृष्ण की मूर्तियां हैं। मुख्य द्वार पर गणेश जी और नंदी जी विराजमान हैं।
दर्शन का समय :- सुबहः लगभग 7 बजे खुलता है (समय में बदलाव हो सकता है। दोपहरः 1 से 2 बजे के बीच विशेष पूजा होती है और मंदिर बंद रह सकता है। शामः लगभग 5 बजे फिर खुलता है और रात 8:30 बजे तक दर्शन कर सकते हैं।
विशेष पूजा :- प्रातःकालः शिवलिंग का प्राकृतिक जल से स्नान और घी लेपन होता है। संध्याकालः भगवान का विशेष श्रृंगार होता है,
इस दौरान दूर से ही दर्शन होते हैं।
तुंगनाथ
तुंगनाथ, पंच केदार का दूसरा मंदिर (तृतीय केदार) है| जहाँ भगवान शिव के भुजा ((हाथ) प्रकट हुए थे। यह दुनिया में सबसे अधिक ऊँचाई पर स्थित शिव मंदिर है।
पौराणिक कथा महाभारत युद्ध के बाद, पाप से मुक्ति पाने के लिए पांडवों द्वारा पंच केदार मंदिरों की स्थापना की गई। पौराणिक कथा के अनुसार,
पांडवों को शिव नाराज थे, इसलिए वे बैल रूप में पृथ्वी में समा गए और उनके शरीर के भाग पांच स्थानों पर प्रकट हुए। उनकी भुजाए ((हाथ) तुंगनाथ में प्रकट हुए।
यह पूरा पंचकेदार का क्षेत्र कहलाता है। ऋषिकेश से श्रीनगर गढ़वाल होते हुए अलकनंदा के किनारे-किनारे यात्रा बढ़ती जाती है। रुद्रप्रयाग पहुंचने पर यदि ऊखीमठ का रास्ता लेना है तो अलकनंदा को छोडकर मंदाकिनी घाटी में प्रवेश करना होता है। यहां से मार्ग संकरा है। इसलिए चालक को गाड़ी चलाते हुए बहुत सावधानी बरतनी होती है। मार्ग अत्यंत लुभावना और सुंदर है। आगे बढ़ते हुए अगस्त्य मुनि नामक एक छोटा सा कस्बा है जहां से हिमालय की नंदाखाट चोटी के दर्शन होने लगते हैं।
चोपता की ओर बढते हुए रास्ते में बांस और बुरांश का घना जंगल और मनोहारी दृश्य पर्यटकों को लुभाते हैं। चोपता समुद्रतल से बारह हज़ार फुट की ऊंचाई पर स्थित है। यहां से तीन किमी की पैदल यात्रा के बाद तेरह हज़ार फुट की ऊंचाई पर तुंगनाथ मंदिर है, जो पंचकेदारों में एक केदार है। चोपता से तुंगनाथ तक तीन किलोमीटर का पैदल मार्ग बुग्यालों की सुंदर दुनिया से साक्षात्कार कराता है। यहां पर प्राचीन शिव मंदिर है। इस प्राचीन शिव मंदिर से डेढ़ किमी की ऊंचाई चढ़ने के बाद चौदह हज़ार फीट पर चंद्रशिला नामक चोटी है। जहां ठीक सामने छू लेने योग्य हिमालय का विराट रूप किसी को भी हतप्रभ कर सकता है। चारों ओर पसरे सन्नाटे में ऐसा लगता है मानो आप और प्रकृति दोनों यहां आकर एकाकार हो उठे हों। तुंगनाथ से नीचे जंगल की सुंदर रेंज और घाटी का जो दृश्य उभरता है, वो बहुत ही अनूठा है। चोपता से लगभग आठ किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद देवहरिया ताल पहुंचा जा सकता है जो कि तुंगनाथ मंदिर के दक्षिण दिशा में है। इस ताल की कुछ ऐसी विशेषता है जो इसे और सरोवरों से विशिष्टता प्रदान करती है। इस पारदर्शी सरोवर में चौखंभा, नीलकंठ आदि हिमाच्छादित चोटियों के प्रतिबिंब स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं। इस सरोवर का कुल व्यास पांच सौ मीटर है। इसके चारों ओर बांस व बुरांश के सघन वन हैं तो दूसरी ओर एक खुला सा मैदान है।
चोपता से गोपेश्वर जाने वाले मार्ग पर कस्तूरी मृग प्रजनन फार्म भी है। यहां पर कस्तूरी मृगों की सुंदरता को निकटता से देखा जा सकता है। मार्च-अप्रैल के महीने में इस पूरे मार्ग में बुरांश के फूल अपनी अनोखी छटा बिखेरते हैं। जनवरी-फरवरी के महीने में ये पूरा क्षेत्र बर्फ से ढका रहता है। चोपता के बारे में ब्रिटिश कमिश्नर एटकिन्सन ने कहा था कि जिस व्यक्ति ने अपने जीवनकाल में चोपता नहीं देखा उसका इस पृथ्वी पर जन्म लेना व्यर्थ है। एटकिन्सन की यह उक्ति भले ही कुछ लोगों को अतिरेकपूर्ण लगे लेकिन यहां का सौन्दर्य अद्भुत है, इसमें किसी को संदेह नहीं हो सकता। किसी पर्यटक के लिए यह यात्रा किसी रोमांच से कम नहीं है।
रुद्रनाथ
रुद्रनाथ पंचकेदार यात्रा का तीसरा या चौथा मंदिर है ((विभिन्न स्रोतों के अनुसार)यह मंदिर समुद्र तल से लगभग 2290 से 3600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और यहाँ भगवान शिव के मुख ((एकानन) की पूजा की जाती है। मान्यता है कि महाभारत युद्ध के बाद,
पांडवों को अपने पापों से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिव का सामना करना पड़ा। शिव ने बैल का रूप धारण किया और विभिन्न स्थानों पर शरीर के अंग प्रकट हुए, जिनमें से (मुख रुद्रनाथ में दिखाई दिया।
दर्शनीय स्थल
स्वयंभू मुख लिंगः मंदिर में एक प्राकृतिक शिला के रूप में उभरा हुआ भगवान शिव का मुख। पवित्र कुंडः सूर्य कुंड, चंद्र कुंड,
तारा कुंड और मानस कुंड जैसे कई पवित्र जलाशय। वैतरणी नदी मंदिर के पास से बहने वाली पवित्र नदी, जो मोक्ष की नदी मानी जाती है
क्यूंकि यहाँ
श्रद्धालु अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए पिंड दान और तर्पण करते हैं
मध्यमहेश्वर
मध्यमहेश्वर पंच केदारों में दूसरा मंदिर है जहां भगवान शिव के नाभि (पेट का मध्य भाग) की पूजा की जाती है। यह समुद्र तल से लगभग 3,497 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।
धार्मिक
महत्व :- पौराणिक कथा के अनुसार, महाभारत युद्ध के बाद भगवान शिव ने पांडवों से रुष्ट होकर बैल का रूप धारण किया। उनका नाभि भाग यहीं प्रकट हुआ,
जिसके बाद पांडवों ने इस मंदिर का निर्माण किया।
पंच केदार यात्रा क्रम में यह चौथा पड़ाव है (केदारनाथ तुंगनाथ रुद्रनाथ मध्यमहेश्वर कल्पेश्वर ।
पूजा की विशेष परंपरा है :- मंदिर के पुजारी दक्षिण भारत (कर्नाटक) के जंगम समुदाय से है, जो आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित परंपरा का हिस्सा है।
प्राकृतिक सुंदरता :- यह प्रकृति की प्रचुरता से भरा एक सुंदर स्थान है।
गढ़वाल में स्थित मध्यमहेश्वर को मदमहेश्वर के रूप में भी जाना जाता है।
चारों ओर पहाड़ों से घिरा हुआ यह स्थान पर्यटकों को बहुत आकर्षित करता है।
यह स्थान हिंदू श्रद्धालु के लिए धार्मिक और आध्यात्मिक रूप में काफी महत्व
रखता है। यहां मौजूद “मध्यमहेश्वर मंदिर” केदारनाथ, तुंगनाथ, रूद्रनाथ और
कल्पेश्वर जैसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक माना जाता है, जिसके चलते कई सैलानी
इस मंदिर के दर्शन के लिए आते है। यह स्थान अध्यात्म के अलावा पर्यटन के
लिए भी जाना जाता है, यहां का अद्भुत प्रकृतिक सौंदर्य और साहसिक
गतिविधियों का आनंद लेने के लिए पर्यटक यहां आते हैं।
कल्पेश्वर
कल्पेश्वर की यात्रा पंचकेदार में सबसे सुलभ मानी जाती है क्योंकि मंदिर वर्षभर खुला रहता है और पहुँच सड़क मार्ग से काफी हद तक संभव है। कल्पेश्वर मन्दिर काफ़ी ऊँचाई पर स्थित है। भगवान शिव को समर्पित यह स्थान पवित्र धाम माना जाता है। कल्पेश्वर उत्तराखण्ड के महत्वपूर्ण तीर्थ स्थलों मे से एक है। यह उत्तराखण्ड के असीम प्राकृतिक सौंदर्य को अपने मे समाए हिमालय की पर्वत शृंखलाओं के मध्य में स्थित है। कल्पेश्वर सनातन हिन्दू संस्कृति के शाश्वत संदेश के प्रतीक रूप मे स्थित है। एक कथा के अनुसार, एक लोकप्रिय ऋषि अरघ्या मन्दिर में कल्प वृक्ष के नीचे ध्यान करते थे। यह भी माना जाता है की उन्होंने अप्सरा उर्वशी को इस स्थान पर बनाया था। कल्पेश्वर मन्दिर के पुरोहित दक्षिण भारत के नंबूदिरी ब्राह्मण हैं। इनके बारे में कहा जाता है की ये आदिगुरु शंकराचार्य के शिष्य हैं।
कुंड तथा पवित्र जल
मुख्य मन्दिर 'अनादिनाथ कल्पेश्वर महादेव' के नाम से प्रसिद्ध है। इस मन्दिर के समीप एक 'कलेवरकुंड' है। इस कुंड का पानी सदैव स्वच्छ रहता है और यात्री लोग यहाँ से जल ग्रहण करते हैं। इस पवित्र जल को पी कर अनेक व्याधियों से मुक्ति पाते हैं। यहाँ साधु लोग भगवान शिव को अर्घ्य देने के लिए इस पवित्र जल का उपयोग करते हैं तथा पूर्व प्रण के अनुसार तपस्या भी करते हैं। तीर्थ यात्री पहाड़ पर स्थित इस मन्दिर में पूजा-अर्चना करते हैं। कल्पेश्वर का रास्ता एक गुफ़ा से होकर जाता है। मन्दिर तक पहुँचने के लिए गुफ़ा के अंदर लगभग एक किलोमीटर तक का रास्ता तय करना पड़ता है, जहाँ पहुँचकर तीर्थयात्री भगवान शिव की जटाओं की पूजा करते हैं।[1]
मुख्य विशेषताः भगवान शिव की जटाओं का स्वरूप पूजित ।
मंदिर खुलने का समय:- पूरे वर्ष खुला
पूजा परंपरा:-
पुजारी दक्षिण भारत के नंबूदिरी ब्राह्मण ((आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित) महत्वपूर्ण आकर्षणः पास में कलेवरकुंड नामक पवित्र कुंड स्थित है।

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